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देहाती

 कल दिखा मुझे एक देहाती  शहर की भाषा उसे नहीं आती  पर थे उसके मीठे बोल  मन में देता मिश्री घोल  छल कपट से दूर था वो  दिखता ज़रा मज़बूर था वो  श्याम वर्ण और दुबली काया  धोती कुर्ता तन पे पाया  सुनी आंखे सागर सा गहरा  जीवन में जैसे दुखों का पहरा  पूछ बैठा मैं तू कहा से आया  क्या शहरी  जीवन नहीं तुझे भाया  बोल पड़ा मैं कल ही आया  दो चार जोड़ कुछ पैसे लाया  सोचा शहर में कुछ काम करूंगा  और थोड़ा आराम करूंगा  अपने भी फिर दिन फिरेगे लोग हमारी भी इज्जत करेंगे  पर क्या पता था शहर नहीं है  हम जैसे गांववालों की  यहां प्यार नहीं है ना अपनापन  सब पैसे मोल बिकते है  इससे अच्छा तो गाँव है अपना  क्यों पाला मैं शहर का सपना  आज ही मैं वापस जाऊँगा  और फिर कभी नहीं शहर आऊंगा 

शख्सीयत

वक्त के धरातल पर  रखे कदम हम कुछ ऐसे  कि लोग कह उठे बिल्कुल नहीं बदला वैसा ही है पहले  था जैसे  परिस्थितियों के थपेड़े  इसको नहीं डिगा सके  सच कहते हैं लोग सब  शख्सियत में अगर दम हो  तो फिर कौन है जो उसे मिटा सके  माना होगी तकलीफें बहुत  इस दुनिया में तुझे जीने में  समुद्र मंथन करना पड़ेगा  इच्छा अगर  हो अमृत पीने में 

अपना गाँव

 कैसे भूलूं रोना धोना  कैसे भूलूं खेल खिलौना  कैसे भूलूं नदियां का पानी  कैसे भूलूं नानी की कहानी  कैसे भूलूं मिट्टी का घर  सुख की खोज में गया शहर  सुख मिली नहीं कहीं पर शान्ति  पेट के लिए दिन रात क्रांति  इससे अच्छा तो गाँव था अपना  क्यों नहीं माना अम्मा का कहना  बोली तो थी मत जा परदेश  क्या नहीं है आपने देश  मिट्टी के घर शीतल बरसता  खेतों में सोना उगलता आपस में है भाई चारा  एक दूजे को है सब प्यारा  साँझ पहर चौपालें  लगती  बड़े बूढे की टोली सजती  हर मुद्दे पर बातेँ होती  मुद्दो की तह खोली जाती  चाहे बात हो राजनीति की  चाहे सत्ता के गणित की  सबका जवाब गाँव में भाई  न जाओ कोई देश पराई 

रूप बड़ा या गुण

 रूप तुम्हारे हाथ नहीं  गुण है तेरे हाथ  एक दिन रूप ढ़ल जाएगा  गुण सदा रहेगी साथ  रूप वाले रूपवान कहलाते  गुण वाले गुणवान  रूप भले ही ढलती जाए  गुण का रखना ध्यान  रूप से कोई महान नहीं  गुण से होता महान  गुणों के कारण ही जग में  मिलता है सम्मान  सुगंधित जो फूल नहीं  उसकी क्या है पहचान  सुगंधित जो फूल है  वही चढ़े भगवान रूप गुणों के टक्कर  सदा गुण की होती जीत  यही हमारी परंपरा  यही हमारी रीति 

बड़ा बेटा

आज के समाज में बेटा  बड़ा होना अभिशाप है  कल तक थी ये पुण्य की बाते  आज मगर ये पाप है  भाई-बहन की बातेँ छोड़ो  माँ-बाप भी कतराते है  कल तक जो था दायित्व निभाता  आज उसी को सब सताते है  करूँ विवाद तो किससे मैं  यह सोच सोच घबराता हू   रिश्ता कैसे स्वार्थ से हरा  देख- देख शर्माता हू  एक प्रश्न  है प्रभु से मेरी  क्या बड़ा बेटा इंसान नहीं  सदा दायित्व निभाता जग में  क्या इसका कोई सम्मान नहीं 

इंसान क्यों बदल गया

 कल रात मुझसे चांद ने ऐसा कुछ सवाल किया  मैं वही खड़ा हू इंसान क्यों बदल गया - 2 क्यों भाई को भाई से आज प्यार नहीं है  क्यों बहनों की राखियाँ वज़ूद को रो रही है  क्यों माँओं के आँखों में आंसुओ की धार है  मैं वही खड़ा हू बदल गया संसार है  कल रात मुझसे चांद ने ऐसा कुछ सवाल किया मैं वही खड़ा हू इंसान क्यों बदल गया - 2 लोगों के बीच मे विश्वास का अभाव है  अनीतिया कुरीतियों का हर तरफ प्रभाव है  शक के दायरे में लोग सभी जी रहे  अपने ही आँसू को घुट घुट पी रहे  झूठ और फरेब का हर तरफ राज है  मै वही खड़ा हू बदल रहा समाज है  कल रात मुझसे चांद ने ऐसा कुछ सवाल किया मैं वही खड़ा हू इंसान क्यों बदल गया - 2 जिंदगी और मुश्किलें हर जगह संग है  किसकी नजर लगी जो खो गया उमंग है  ऊपर वाले अब तेरी ही आस है  तू ही कुछ करेगा ये मेरा विश्वास है  छोड़ कर इंसान को इंसानियत चल गया   मै वही खड़ा हू इंसान क्यों बदल गया  कल रात मुझसे चांद ने ऐसा कुछ सवाल किया मैं वही खड़ा हू इंसान क्यों बदल गया - 2

ये दुनिया बड़ी मतलबी है

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